'¿Volverás a hacer el papel, podrás recuperar a tu hija?': Pregunta de la madre que perdió a su hija en una fuga de papel NEET; Padre ni siquiera pudo ver los últimos ritos de su hija
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“पेपर तो दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या?...
“पेपर तो दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या?... वो आज भी मेरी आंखों के सामने खड़ी हो जाती है। कहती है- मां मुझे माफ कर देना। मैं डॉक्टर नहीं बन पाई। आपके और पापा के सपने पूरे नहीं कर पाई। मेरी बच्ची का क्या कसूर था? क्या गरीब परिवार में जन्म लेकर डॉक्टर बनने का सपना देखना ही उसका गुनाह था?” यह कहते-कहते नीलम चतुर्वेदी फफक पड़ती है। शब्द गले में अटक जाते हैं। आंसू रुकने का नाम नहीं लेते। नीट पेपर लीक मामले के बाद नागपुर में सुसाइड करने वाली मऊगंज की छात्रा आकांक्षा चतुर्वेदी के घर में 11 दिन बाद भी मातम पसरा हुआ है। दैनिक भास्कर की टीम जब परिवार का हाल जानने उनके घर पहुंची तो एक पुराने जर्जर खपरैल के मकान में पूरा परिवार टूट चुका था। मां रो-रोकर बेटी को याद कर रही थी, जबकि पिता अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। परिवार पर 15 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज है। मां ने कहा- अब क्या बोलूं और कैसे बोलूं... मेरी तो पूरी जिंदगी उजड़ गई। इकलौती बेटी पेपर लीक का शिकार हो गई। पेपर लीक ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था परिजनों के मुताबिक, आकांक्षा मेधावी छात्रा थी। उसे 650 से अधिक अंक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक की खबरों ने उसे मानसिक तनाव में धकेल दिया। परीक्षा दोबारा होने की आशंकाओं के बीच वह पूरी तरह टूट गई थी। बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए पिता कृष्णकुमार चतुर्वेदी ने करीब 15-20 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज ले रखा है। पिता अपनी बेटी का अंतिम संस्कार तक नहीं देख पाए। बेटी की मौत की खबर सुनते ही उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें नागपुर के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। डॉक्टरों के मुताबिक, वे डिप्रेशन में हैं। परिवार का कहना है कि जिस बेटी की पढ़ाई के लिए पिता ने जिंदगी भर की कमाई और भविष्य दांव पर लगा दिया, उसी बेटी को आखिरी विदाई देना भी उनके नसीब में नहीं था। इधर निजी अस्पताल में इलाज के चलते परिवार पर आर्थिक बोझ और बढ़ता जा रहा है। दो हार्ट अटैक और लकवा के बाद भी मेहनत करते रहे नीलम बताती हैं- पति हार्ट पेशंट हैं। उन्हें दो बार अटैक आ चुका है। हर बार ईश्वर ने उन्हें बचा लिया। 2 साल पहले उन्हें लकवा मार गया। एक समय ऐसा आया कि हाथ-पैर चलाना तक मुश्किल हो गया। काफी समय तक बेड पर पड़े रहे। एक दिन बहुत उदास हो गए। एक दिन कहने लगे, अगर मैं इसी तरह बिस्तर पर पड़ा रहा तो आगे क्या होगा? बिटिया की पढ़ाई के सिलसिले में पहले ही बहुत कर्ज हो गया है। मुझे कुछ भी करके फिर से काम शुरू करना पड़ेगा। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की। उनसे कहा- आप दो-दो बार हार्ट अटैक से उबरे हैं। अभी लकवा का शिकार हैं। आपको कुछ हो गया तो हम क्या करेंगे। उन्होंने कहा- मुझे कुछ नहीं होगा। तुम चिंता क्यों करती हो। बेटी पढ़ लिखकर डॉक्टर बन जाएगी तो सारी परेशानी दूर हो जाएगी। कुछ दिनों बाद वे काम पर जाने लगे। मौत के 3 दिन पहले खाना-पीना छोड़ दिया था आकांक्षा के छोटे भाई राज चतुर्वेदी ने बताया कि दीदी हमेशा अपने डॉक्टर बनने के सपने के बारे में ही बात करती थी। कभी कोई दूसरी बात नहीं करती थी। मैं भी दीदी के साथ नागपुर में ही रहता था। वो जिस दिन पेपर देकर आई थी तो बहुत खुश थी। उसकी आंखों में एक चमक थी। कह रही थी कि मेरा पेपर तो ऐसा गया है कि सब कुछ बन गया। अब मेरे डॉक्टर बनने का सपना पूरा हो जाएगा। जब से पेपर लीक होने की बात सामने आई, तब से वह डिप्रेशन में चली गईं। सुसाइड के 3 दिन पहले से ही खाना-पीना छोड़ दिया था। चुप-चुप सी रहने लगी थी। हमने बात भी करने की कोशिश की, लेकिन उसने कुछ नहीं बताया। 90 साल की दादी बोली - इससे अच्छा तो मौत आ जाती आकांक्षा की 90 साल की दादी यशोदा चतुर्वेदी भी अब अपने भाग्य को कोस रही हैं। उन्होंने कहा- अब बोलने के लिए रह ही क्या गया? जिस उम्र में अब मुझे खुद कुछ दिनों बाद मर जाना है, उस उम्र में अब पोती की मौत देखी। कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी दिन आएगा कि अपनी तीसरी पीढ़ी की मौत अपनी आंखों के सामने देखनी पड़ेगी। पहले अपनी लंबी आयु को भगवान का वरदान मानती थी, लेकिन अब ऐसा लगता है जैसे कि यह किसी शाप की तरह है। ये दिन देखने से अच्छा तो मुझे मौत आ जाती। कम से कम सुकून से मर जाती। बड़े पिता बोले- डोली उठाना थी, अर्थी उठाना पड़ी बड़े पिता हनुमान प्रसाद चतुर्वेदी ने कहा कि जिस उमर में बेटी की डोली उठाना थी, अब उस उम्र में बेटी की अर्थी उठाना पड़ी। भला इससे अधिक दुखदाई क्या हो सकता है। मेरा कलेजा कांप गया, जब मैंने अपने इन्हीं कंधों से उसकी अर्थी को कंधा दिया। मां बोली- इस भ्रष्ट सिस्टम ने ली है बेटी की जान आकांक्षा की मां नीलम ने रोते हुए कहा कि मेरी बेटी की जान इस भ्रष्ट सिस्टम ने ले ली है। सरकार को क्या फर्क पड़ता है। Una persona pobre puede vivir o morir. Si el periódico no se hubiera filtrado hoy, mi hija habría estado viva. Dijo que volverá a hacer el trabajo. ¿Podrás devolverle la vida a mi hija? ¿Tiene la capacidad de compensar nuestra pérdida? Nuestra única hija se ha ido. Tan pronto como se filtró el documento, recordó la enorme deuda de su padre y dio este paso. La delegación de la oposición proporcionó ayuda por valor de 2,5 lakh de rupias. El primo y hermano mayor de Akanksha, Rahul Chaturvedi, dijo que el partido gobernante no brindó ninguna ayuda aquí, pero algunas personas de la oposición habían venido. Ha proporcionado asistencia financiera de 2,5 rupias lakh. Ahora la gente del pueblo no quiere enviar a sus hijas a estudiar afuera. Kusum Chaturvedi, de la familia, dijo que este incidente ha sacudido a cada persona desde dentro. Anteriormente, la gente del pueblo y de las zonas circundantes no prestaba suficiente atención a la educación de sus hijas como para enviarlas al extranjero para estudiar medicina. Lea también esta noticia... 'Lo siento mamá y papá, no tengo el coraje de volver a dar el examen NEET' Mamá y papá, ustedes estaban seguros de que su hija se convertiría en doctora después de estudiar, pero ahora no tengo el coraje de volver a dar el examen NEET. Este fue el dolor de Akanksha Chaturvedi, que se estaba preparando para la prueba nacional de elegibilidad y acceso (NEET) de 2026. Akanksha se ahorcó en Nagpur el 20 de mayo. Leer noticia completa
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