उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से सात साल बाद भारत-चीन (तिब्बत) व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है। इसके लिए विदेश मंत्रालय से 300 ट्रेड पास मिलने के बाद सोमवार को धारचूला में ट्रेड कार्यालय खोल दिया गया। जिसके बाद पहले ही दिन 20 व्यापारियों ने आवेदन किया। साथ ही गुंजी में कस्टम कार्यालय और बैंक शाखा भी शुरू हो गई है। खास बात यह है कि व्यापारियों को मिलने वाला भारत-तिब्बत ट्रेड पास सामान्य पासपोर्ट की तरह विदेश यात्रा के लिए नहीं, बल्कि सीमित अवधि और तय सीमा क्षेत्र में व्यापार के लिए जारी किया जाने वाला विशेष अनुमति-पत्र है। व्यास घाटी स्थित लिपुलेख दर्रे से सदियों से भारत-तिब्बत के बीच परंपरागत व्यापार होता रहा है। पहले तिब्बती व्यापारी नमक, ऊन और भेड़ लेकर भारत आते थे, जबकि भारतीय व्यापारी तिब्बत की तकलाकोट मंडी में गुड़, मिश्री, अनाज और मसाले लेकर जाते थे। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया था। वर्ष 1991 में इसे फिर शुरू किया गया, लेकिन पिछले सात वर्षों से कारोबार ठप पड़ा था। अब प्रशासनिक तैयारियां पूरी होने के बाद एक बार फिर व्यापारिक गतिविधियां शुरू होने की राह साफ हो गई है। प्रशासन की 3 बड़ी तैयारियां… 1. ट्रेड ऑफिस खुला, पहले दिन 20 आवेदन पहुंचे धारचूला में ट्रेड अधिकारी एवं उपजिलाधिकारी आशीष जोशी ने रिबन काटकर ट्रेड कार्यालय का उद्घाटन किया। कार्यालय खुलते ही भारत-तिब्बत व्यापार के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू हो गई। पहले ही दिन 20 व्यापारियों ने ट्रेड पास के लिए आवेदन किया। अधिकारियों ने व्यापारियों के साथ बैठक कर व्यापार से जुड़ी व्यवस्थाओं और नियमों की जानकारी भी दी। 2. एसआईबी जांच के बाद जारी होंगे ट्रेड पास उपजिलाधिकारी आशीष जोशी ने बताया कि सभी आवेदनों की वाणिज्य कर विभाग की एसआईबी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच) जांच कराई जाएगी। सुरक्षा और अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही व्यापारियों को ट्रेड पास जारी किए जाएंगे। प्रशासन का कहना है कि व्यापार संचालन के लिए आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। 3. गुंजी में कस्टम ऑफिस और बैंक शाखा शुरू जिलाधिकारी आशीष भटगांई के अनुसार भारत-चीन व्यापार को देखते हुए धारचूला से 72 किलोमीटर दूर गुंजी में कस्टम कार्यालय, बैंक शाखा और अन्य जरूरी कार्यालय शुरू कर दिए गए हैं। आयात-निर्यात होने वाले सामान की जांच यहीं होगी। सुरक्षा, संचार और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को भी अंतिम रूप दे दिया गया है। नेपाली हेल्परों को अनुमति देने की मांग भारत-चीन व्यापार समिति के अध्यक्ष जीवन सिंह रोंकली ने शासन और प्रशासन से नेपाली हेल्परों को साथ ले जाने की अनुमति देने की मांग की है। उनका कहना है कि भारत में पर्याप्त संख्या में हेल्पर नहीं मिल पाते, जबकि नेपाल में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। समिति के महासचिव दौलत सिंह रायपा ने सात साल बाद व्यापार शुरू होने पर केंद्र और राज्य सरकार का आभार जताया। सामान्य पासपोर्ट से इतना अलग ट्रेड पास… 1. विदेश यात्रा का नहीं, सीमा व्यापार का दस्तावेज सामान्य पासपोर्ट भारत सरकार का आधिकारिक यात्रा दस्तावेज है, जिसके जरिए व्यक्ति वीजा नियमों के तहत दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा कर सकता है। इसके विपरीत भारत-तिब्बत ट्रेड पास केवल सीमा व्यापार से जुड़े अधिकृत लोगों को जारी किया जाता है। यह पर्यटन, नौकरी या अन्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए मान्य नहीं होता। 2. तय मार्ग और सीमित अवधि के लिए मान्य सामान्य पासपोर्ट कई वर्षों तक वैध रहता है और धारक को विभिन्न देशों की यात्रा की अनुमति देता है। वहीं ट्रेड पास केवल निर्धारित ट्रेड सीजन और अधिकृत व्यापारिक मार्ग, जैसे लिपुलेख दर्रा-तकलाकोट क्षेत्र के लिए ही जारी किया जाता है। इसकी वैधता सीमित होती है और अवधि समाप्त होने पर इसका उपयोग नहीं किया जा सकता। 3. विशेष अनुमति-पत्र, जिसमें भूमिका भी तय होती है ट्रेड पास सामान्य पहचान दस्तावेज नहीं, बल्कि सीमा व्यापार के लिए जारी विशेष अनुमति-पत्र है। यह केवल पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को दिया जाता है। पास में धारक की श्रेणी भी दर्ज होती है। इसे किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और ट्रेड सीजन समाप्त होने पर संबंधित प्राधिकरण को वापस जमा करना पड़ता है। पात्रता से मंजूरी तक पूरी प्रक्रिया भारत-तिब्बत ट्रेड पास सामान्य पर्यटकों के लिए नहीं, बल्कि सीमा व्यापार से जुड़े पंजीकृत व्यापारियों, उनके सहायकों, पोर्टर, कुली और म्यूल (खच्चर) चालकों को जारी किया जाता है। पास बनवाने के लिए आवेदक का नाम सीमा व्यापार या पंजीकृत व्यापारी सूची में होना जरूरी है। इसके बाद आवेदन ट्रेड कार्यालय या जिला प्रशासन के पास जमा किया जाता है। आवेदन मिलने पर एसआईबी (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच) समेत अन्य सुरक्षा और प्रशासनिक जांच होती है। सभी मंजूरियां मिलने के बाद ट्रेड पास जारी किया जाता है। इसके लिए पहचान पत्र, स्थानीय निवासी या व्यापारी प्रमाण, व्यापार पंजीकरण दस्तावेज, फोटो और सुरक्षा क्लीयरेंस से जुड़े रिकॉर्ड की जरूरत पड़ सकती है। अंतिम दस्तावेजों की सूची संबंधित जिला प्रशासन की अधिसूचना के अनुसार तय होती है। पहली बार सड़क आधारित मॉडल में बदलेगा व्यापार अब तक लिपुलेख दर्रे से होने वाला कारोबार पूरी तरह पारंपरिक ढुलाई व्यवस्था पर निर्भर था। व्यापारी धारचूला से गुंजी, कालापानी और नाभीढांग होते हुए कई दिन की कठिन यात्रा कर दर्रे तक पहुंचते थे। सामान घोड़े-खच्चरों, याक और पोर्टरों के जरिए ढोया जाता था। खराब मौसम और भूस्खलन कई बार व्यापार रोक देते थे। कुमाऊं यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता सुमन जोशी के मुताबिक पहले सीमांत समुदाय नेपाल से चावल, जौ और गेहूं लेकर तिब्बत की ग्यानिमा और गरहाटोक मंडियों तक पहुंचते थे, जहां बदले में नमक और बोरेक्स लिया जाता था। कई जगह एक नाली चावल के बदले पांच नाली नमक तक का विनिमय होता था। अब सड़क बनने के बाद करीब 100 किलोमीटर तक वाहन सीधे सीमा के करीब पहुंच सकेंगे। सिर्फ अंतिम करीब 200 मीटर तक ही सामान पारंपरिक तरीके से ले जाया जाएगा। इसके बाद चीन क्षेत्र में सड़क मार्ग उपलब्ध रहेगा, जहां से व्यापारी करीब 18 किलोमीटर दूर तकलाकोट मंडी पहुंचेंगे। तकलाकोट की नई मंडी में मिलेंगी दुकानें करीब 7 साल तक व्यापार बंद रहने के दौरान तकलाकोट की पुरानी मंडी की कई दुकानें नेपाली और अन्य व्यापारियों को आवंटित कर दी गई थीं। अब भारतीय और नेपाली व्यापारियों के लिए नई ट्रेड मंडी विकसित की गई है। इसी नई मंडी में भारतीय व्यापारियों को दुकानें दी जाएंगी। व्यापार समिति का कहना है कि नई मंडी पहले के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित है और वहां सामान रखने के लिए अधिक जगह उपलब्ध होगी। भारतीय व्यापारियों के लिए रियायती किराए और बेहतर लॉजिस्टिक सुविधा की भी मांग की गई है। व्यापार से जुड़े लोगों का मानना है कि सड़क और आधुनिक सुविधाओं के कारण आने वाले वर्षों में कारोबार का दायरा और बढ़ सकता है। 2019 में करोड़ों का कारोबार, अब बढ़ने की उम्मीद 2019 में इस मार्ग से करीब तीन करोड़ रुपए का व्यापार हुआ था, जिसमें लगभग 1.25 करोड़ रुपए का निर्यात और 1. 90 करोड़ रुपये का आयात शामिल था। अब सड़क और आधुनिक सुविधाओं के साथ व्यापार फिर शुरू होने जा रहा है, ऐसे में इस आंकड़े के काफी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। व्यापार बंद होने के कारण कई भारतीय व्यापारी अपना सामान तिब्बत की तकलाकोट मंडी में ही छोड़ आए थे। पिछले छह साल से करीब 45 व्यापारियों का एक करोड़ रुपये से ज्यादा का सामान वहां फंसा हुआ है। अब व्यापार शुरू होने से इन व्यापारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वे अपना सामान वापस ला सकेंगे या उसे बेच सकेंगे। सदियों से व्यापार, संस्कृति और भरोसे का रास्ता रहा लिपुलेख लिपुलेख दर्रा सिर्फ सीमा कारोबार का रास्ता नहीं, बल्कि सदियों से भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच संपर्क का प्रमुख मार्ग रहा है। सीमांत क्षेत्रों में लंबे समय तक वस्तु विनिमय प्रणाली पर आधारित व्यापार चलता था। ब्रिटिश अधिकारी और लेखक सर फ्रांसिस एडवर्ड यंगहसबैंड ने अपनी किताब 'इंडिया एंड तिब्बत' में हिमालयी व्यापारिक रास्तों को भारत और तिब्बत के बीच सांस्कृतिक और व्यापारिक संपर्क का माध्यम बताया था। इन रास्तों से सिर्फ सामान नहीं, बल्कि परंपराएं, भाषाएं और सीमांत समाजों के रिश्ते भी एक इलाके से दूसरे इलाके तक पहुंचते थे। तिब्बत के साथ यह संपर्क सिर्फ मंडियों तक सीमित नहीं था। सीमांत इलाकों के मेले, धार्मिक यात्राएं और कारोबारी काफिले भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच सामाजिक संबंधों का भी आधार बने हुए थे। जौलजीबी जैसे मेले लंबे समय तक त्रिपक्षीय व्यापारिक केंद्र के रूप में पहचाने जाते रहे। कौन हैं रं समुदाय, जिन्होंने जिंदा रखा हिमालयी व्यापार लिपुलेख दर्रे से होने वाले पारंपरिक व्यापार में रं समुदाय की सबसे अहम भूमिका रही है। यह समुदाय मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की ब्यास, दारमा और चौंदास घाटियों में निवास करता है। रं समाज को भोटिया या शौका समुदाय का हिस्सा भी माना जाता है। सदियों तक यही समुदाय दुर्गम हिमालयी रास्तों में भारत-तिब्बत व्यापार को जिंदा रखे हुए था। इनके रहन-सहन, खानपान और पहनावे में तिब्बती संस्कृति की झलक दिखाई देती है। यह समुदाय अपनी ऊनी बुनाई, लोक संस्कृति और सीमांत जीवनशैली के लिए जाना जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड में भोटिया जनजाति की आबादी 39 हजार से ज्यादा थी। व्यापार से पहले पी जाती थी शराब सुमन जोशी की एक सोध के अनुसार ऊंचे इलाकों में बर्फबारी होने पर कई भोटिया परिवार सर्दियों में नेपाल के निचले इलाकों में अस्थायी घर बनाकर रहते थे, जबकि गर्मियों में व्यापारिक काफिलों के साथ तिब्बत की मंडियों तक पहुंचते थे। नेपाल और तिब्बत के बीच यही सीमांत समुदाय कारोबारी पुल की तरह काम करता था। व्यापार शुरू करने से पहले भारतीय व्यापारियों और तिब्बती कारोबारियों के बीच ‘Share Chu-Dul Chyu’ नाम की मित्रता रस्म निभाई जाती थी। दोनों पक्ष चांदी के पात्र में शराब पीते, घी, सत्तू, ऊन और सोने को छूकर भरोसे का प्रतीक मानते थे। दोस्ती के प्रमाण के तौर पर पत्थर के टुकड़े तक संभालकर रखे जाते थे। सीमांत बाजारों से मैदानों तक पहुंचता था सामान ब्रिटिश दौर में जौलजीबी, झूलाघाट और धारचूला जैसे सीमांत कस्बे भारत-नेपाल-तिब्बत व्यापार के प्रमुख केंद्र माने जाते थे। व्यापारी घी, शहद, गुड़, नमक, ऊन, कालीन, जड़ी-बूटियां और पशु उत्पाद लेकर इन मंडियों तक पहुंचते थे। कई व्यापारी यहां से सामान लेकर टनकपुर, हल्द्वानी और काठगोदाम की मंडियों तक जाते थे। नेपाल से आने वाले लोग 10 से 15 दिन तक पैदल सफर कर झूलाघाट पहुंचते थे। उस दौर में नेपाल से घी, शहद और खुकरी आती थी, जबकि भारत से कपड़ा, नमक, चीनी और दूसरी जरूरी वस्तुएं वहां भेजी जाती थीं। जौलजीबी मेला लंबे समय तक भारत, नेपाल और तिब्बत के बीच पारंपरिक व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता रहा। व्यापार खुलने से सीमांत इलाकों में बढ़ी नई उम्मीद लंबे समय तक सीमा कारोबार बंद रहने से धारचूला, गुंजी और आसपास के सीमांत इलाकों की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई थीं। स्थानीय दुकानदारों, ट्रांसपोर्ट कारोबारियों, पोर्टरों और घोड़े-खच्चर संचालकों पर इसका सीधा असर पड़ा था। अब व्यापार फिर शुरू होने की खबर के बाद सीमांत क्षेत्रों में हलचल बढ़ने लगी है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि आदि कैलाश यात्रा और सीमा व्यापार के साथ रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। व्यापार समिति का कहना है कि सड़क और आधुनिक परिवहन व्यवस्था के कारण युवा व्यापारी भी अब इस कारोबार में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यदि बैंकिंग, मुद्रा विनिमय और परिवहन व्यवस्था मजबूत हुई तो यह कारोबार सीमांत अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा सहारा बन सकता है। नेपाल की आपत्ति से फिर चर्चा में आया सीमा विवाद लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र को लेकर नेपाल Выражали возражение и раньше. В 2019 году, после новой карты правительства Индии, Непал также выпустил новую политическую карту, на которой заявил права на всю эту территорию. Позже его одобрил и парламент Непала. Непал утверждает, что эта территория является его частью, а Индия считает ее своей территорией на основании Сигаульского договора. Именно по этой причине вся эта территория, связанная с торговлей между Индией и Китаем и Кайлаш-Мансаровар-ятрой, считается очень стратегически важной. ----------------------- Прочтите также эту новость…. Пограничный спор между Индией и Непалом по поводу происхождения реки: Эксперт рассказал - Почему память о Калапани пришла спустя 200 лет, Липулех всегда был частью Индии? Кайлаш Мансаровар Ятра начнется 4 июля. Согласно установленному маршруту, путешественники, направляющиеся к Кайласу из Уттаракханда, будут проходить через перевал Липулех, но правительство Непала недавно снова предъявило права на перевал Липулех и обратилось к путешественникам с призывом не путешествовать по этому маршруту. (Читать полную новость)