Первая партия Кайлаш Мансаровара прибудет в Уттаракханд 4 июля: в каждой группе будет 50 преданных, KMVN возьмет на себя все вопросы, начиная от проживания и питания.
📖 Источник статьи — 🇮🇳 Хиндиउत्तराखंड के रास्ते होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा-2026 की तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। बुधवार को पिथौरागढ़ जिला कार्यालय में हुई समीक्षा बैठक में जिलाधिकारी आशीष कुमार भट्टगांई ने बताया कि यात्रा के सफल संचालन के लिए सभी विभागों ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली हैं। यात्रा का पहला दल 4 जुलाई को उत्तराखंड पहुंचेगा। इस साल यात्रा में कुल 10 दल शामिल होंगे। प्रत्येक दल में 50 श्रद्धालु होंगे। इस तरह लिपुलेख मार्ग से कुल 500 श्रद्धालु कैलाश मानसरोवर यात्रा करेंगे। यात्रियों के आवागमन के लिए कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) की ओर से 12 वाहनों की व्यवस्था की जाएगी। KMVN के जीएम मनीष कुमार के अनुसार प्रशासन और निगम की टीमें रूट का लगातार जायजा ले रही हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो। इस बार यात्रा को लेकर सबसे बड़ा बदलाव ये है कि अब लगभग पूरी यात्रा सड़क मार्ग से होगी। जहां पहले 60 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलना पड़ता था, वहीं अब कुल यात्रा में सिर्फ 38 किलोमीटर ट्रेक ही बचा है। पूरी यात्रा 1738 किलोमीटर की होगी, जिसमें ज्यादातर दूरी वाहन से तय की जाएगी। पहले जानिए आज की बैठक में क्या हुआ अब कैलाश मानसरोवर की इस पूरी यात्रा के बारे में जानिए… दिल्ली में 4 दिन की तैयारी- यहीं से तय होता है सफर यात्रा का पहला चरण दिल्ली से शुरू होता है। शेड्यूल के अनुसार यात्री 30 जून को दिल्ली पहुंचेंगे। 1 जुलाई को पासपोर्ट और वीजा फीस कलेक्शन के साथ दिल्ली हार्ट एंड लंग इंस्टीट्यूट में स्वास्थ्य परीक्षण होगा। 2 जुलाई को ITBP बेस हॉस्पिटल में विस्तृत मेडिकल जांच की जाएगी। इसके बाद 3 जुलाई को विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग, चाइनीज वीजा, फॉरिन एक्सचेंज और केएमवीएन फीस जमा करने की प्रक्रिया पूरी होगी। इन चार दिनों में यात्रियों की पूरी स्क्रीनिंग हो जाती है और जो फिट पाए जाते हैं, वही आगे यात्रा के लिए रवाना होते हैं। दिल्ली से कैलाश तक दिन-वार सफर 4 जुलाई को पहला दल दिल्ली से टेंपो ट्रैवलर के जरिए टनकपुर के लिए रवाना होगा, जहां रात में ठहराव होगा। अगले दिन टनकपुर से धारचूला पहुंचकर यात्रियों का रात्रि विश्राम होगा। तीसरे दिन धारचूला से गुंजी पहुंचा जाएगा। गुंजी इस यात्रा का अहम पड़ाव है, जहां यात्रियों को एक दिन रुककर मेडिकल जांच और शरीर को ऊंचाई के अनुसार ढालने (एक्लेमेटाइजेशन) की प्रक्रिया से गुजरना होता है। इसके बाद दल कालापानी होते हुए नाभीढांग पहुंचेगा और यहां रात में ठहरेगा। अगले दिन लिपुलेख दर्रे को पार कर चीन के पुरांग काउंटी में प्रवेश किया जाएगा, जहां रात्रि विश्राम होगा। पुरांग में एक दिन रुकने के बाद यात्री मानसरोवर और राक्षस ताल के दर्शन करते हुए आगे बढ़ेंगे। इसके बाद तारकीन पहुंचकर झिरेपु गेस्ट हाउस में ठहराव होगा, जहां से कैलाश परिक्रमा शुरू होती है। परिक्रमा के दौरान यात्रियों को झिरेपु से ज़ुन्झुई पु और फिर आगे बढ़ते हुए चुगू तक पहुंचना होता है। इसी चरण में डोलमा पास पार किया जाता है, जो यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा माना जाता है। लौटते समय- कैलाश से दिल्ली तक वापसी का पूरा प्लान कैलाश परिक्रमा पूरी होने के बाद वापसी यात्रा चुगू से शुरू होती है। यहां से दल बस के जरिए पुरांग काउंटी पहुंचता है, जहां एक बार फिर ठहराव होता है। इसके बाद यात्रियों का दल लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत में प्रवेश करता है और नाभीढांग होते हुए बुधी पहुंचता है। बुधी में रात्रि विश्राम के बाद अगला पड़ाव चौकोड़ी होता है, जहां पहुंचने के लिए जीप और टेंपो ट्रैवलर का उपयोग किया जाता है। चौकोड़ी से यात्रियों को अल्मोड़ा ले जाया जाता है। यहां एक रात रुकने के बाद अगला दिन यात्रा का अंतिम चरण होता है, जिसमें अल्मोड़ा से भीमताल और हल्द्वानी होते हुए दिल्ली पहुंचा जाता है। इस तरह पूरी यात्रा एक सर्कुलर रूट में पूरी होती है, जिसमें जाने और आने के रास्ते अलग-अलग पड़ावों से होकर गुजरते हैं, जिससे यात्रियों को कुमाऊं के अलग-अलग क्षेत्रों के दर्शन भी होते हैं। कुल दूरी और ट्रेक- अब कितना आसान हुआ सफर इस बार कैलाश मानसरोवर यात्रा की कुल दूरी 1738 किलोमीटर होगी। इसमें लगभग 1690 किलोमीटर यात्रा वाहन से और सिर्फ 38 किलोमीटर पैदल ट्रेक रहेगा। साल 2019 से पहले यात्रियों को धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक 60 किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलना पड़ता था। रास्ते में ऑक्सीजन की कमी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यात्रा काफी चुनौतीपूर्ण होती थी। अब भारत और चीन दोनों तरफ सड़क बनने के बाद यह यात्रा काफी आसान हो गई है। सीमावर्ती क्षेत्र तक वाहन पहुंचने लगे हैं, जिससे बुजुर्ग और पहली बार यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह यात्रा पहले की तुलना में ज्यादा सुलभ हो गई है। क्यों खास है इस साल की Ятра – редкая йога, сформировавшаяся спустя 60 лет. Кайлаш Мансаровар Ятра в этом году считается особенной и с религиозной точки зрения. Через 60 лет формируется редкое сочетание года Агни Ашвы, которое считается важным временем достижения спасения в индуизме, буддизме и джайнизме. По мнению тибетского астролога Даулата Райпы, это особенный год в 60-летнем цикле. Считается, что результат одной парикрамы, совершенной в этом году, равен 12 парикрамам в обычные годы. По этой причине на этот раз ожидается участие в этой ятре преданных не только из страны, но и со всего мира.
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