करीब 86 साल से फाइलों और बैठकों के बीच अटकी किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना अब अपने सबसे अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। वर्षों से जल बंटवारे, लागत साझेदारी और राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दों में उलझी यह परियोजना आखिरकार आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई महत्वपूर्ण बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान किशाऊ परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर सहमत हो गए हैं। इसके साथ ही उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में शामिल किशाऊ बांध के निर्माण की दिशा में बड़ा रास्ता साफ हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को सहमति के जरिए आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। किशाऊ परियोजना पर बनी यह सहमति भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा। बैठक में क्या हुआ फैसला?
करीब 86 साल से फाइलों और बैठकों के बीच अटकी किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना अब अपने सबसे अहम पड़ाव पर पहुंच गई है। वर्षों से जल बंटवारे, लागत साझेदारी और राज्यों के बीच सहमति जैसे मुद्दों में उलझी यह परियोजना आखिरकार आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई महत्वपूर्ण बैठक में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान किशाऊ परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन (MoU) पर सहमत हो गए हैं। इसके साथ ही उत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में शामिल किशाऊ बांध के निर्माण की दिशा में बड़ा रास्ता साफ हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार लंबे समय से लंबित राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं को सहमति के जरिए आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। किशाऊ परियोजना पर बनी यह सहमति भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखा जाएगा। बैठक में क्या हुआ फैसला? सबसे अहम फैसला परियोजना के जल घटक की लागत को लेकर हुआ। तय किया गया कि जल घटक के कार्य की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी। शेष 10 प्रतिशत खर्च छह राज्यों- हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान द्वारा साझा किया जाएगा। बैठक में एक और महत्वपूर्ण सहमति बनी। हिमाचल प्रदेश के विद्युत घटक की लागत में हिस्सेदारी के बदले हिमाचल प्रदेश को आवंटित पानी का हिस्सा दिल्ली और राजस्थान को उपलब्ध कराया जाएगा। केंद्र सरकार का मानना है कि यह निर्णय यमुना नदी में स्वच्छ जल प्रवाह बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा और यमुना पुनर्जीवन अभियान को मजबूती देगा। बैठक में कौन-कौन रहा मौजूद? नई दिल्ली में हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में केंद्रीय विद्युत मंत्री मनोहर लाल, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शामिल हुए। इसके अलावा केंद्रीय गृह सचिव, जल शक्ति सचिव, विद्युत मंत्रालय के सचिव, हिमाचल और उत्तराखंड के मुख्य सचिव तथा गृह मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय और जल शक्ति मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। पहले समझिए क्या है किशाऊ बहु-उद्देशीय परियोजना? किशाऊ बांध परियोजना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर प्रस्तावित है। टोंस नदी यमुना की प्रमुख सहायक नदी है। यह एक राष्ट्रीय बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण और यमुना में पर्यावरणीय जल प्रवाह सुनिश्चित करना है। प्रस्तावित बांध की ऊंचाई करीब 232 से 236 मीटर होगी, जिससे यह देश की सबसे बड़ी बांध परियोजनाओं में शामिल होगी। अब जानिए कैसे कागजों में अटका रहा ये प्रोजेक्ट 1940 में हुई थी परियोजना की पहली कल्पना किशाऊ परियोजना का इतिहास करीब 86 साल पुराना है। इसकी पहली परिकल्पना वर्ष 1940 में ब्रिटिश शासन के दौरान की गई थी। इसके बाद तत्कालीन पंजाब सरकार ने 1944-45 में परियोजना क्षेत्र का सर्वेक्षण कराया। प्रारंभिक अध्ययन में यहां बड़े जलाशय की संभावना दिखाई दी, लेकिन 1946 में प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से सर्वेक्षण का काम रोक दिया गया। 1960 के दशक में फिर शुरू हुई कोशिश करीब डेढ़ दशक बाद 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने परियोजना को फिर से आगे बढ़ाने का फैसला किया। विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 1964 में प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (पीपीआर) तैयार की गई। इसमें 235 मीटर ऊंचे ग्रेविटी आर्च बांध का प्रस्ताव रखा गया। इस प्रस्ताव को 1965 में चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को भेजा गया। लेकिन इसी दौरान केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की समीक्षा में एक बड़ी समस्या सामने आई। फॉल्ट लाइन बनी सबसे बड़ी रुकावट जांच में पता चला कि प्रस्तावित बांध स्थल एक प्रमुख भू-वैज्ञानिक फॉल्ट लाइन पर स्थित है। इसे सुरक्षा की दृष्टि से जोखिमपूर्ण माना गया। इसके बाद केंद्रीय जल आयोग ने ग्रेविटी आर्च बांध के बजाय रॉकफिल बांध के विकल्प पर विचार करने की सलाह दी। वर्ष 1970 में उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने दोबारा सर्वेक्षण शुरू किया और 1978 में नई डीपीआर तैयार की। हालांकि दूसरी रिपोर्ट में भी राहत नहीं मिली। भूगर्भीय जांच में सामने आया कि मूल किशाऊ स्थल रॉकफिल बांध के लिए भी उपयुक्त नहीं है। इसके बाद मूल स्थल को लगभग खारिज कर दिया गया। नए स्थानों की तलाश शुरू हुई मूल स्थल अनुपयुक्त पाए जाने के बाद अटल, सांबरखेड़ा और मोहर ाड़ नामक तीन नए स्थानों का अध्ययन किया गया। विस्तृत भू-वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद सांबरखेड़ा को सबसे उपयुक्त स्थान माना गया। रिपोर्ट में यहां 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाने की सिफारिश की गई। वहीं अटल और मोहराड़ को इतने बड़े बांध के लिए सुरक्षित नहीं माना गया। 1988 और 1998 में तैयार हुई नई डीपीआर सांबरखेड़ा स्थल के आधार पर वर्ष 1988 में नई डीपीआर तैयार की गई। बाद में इसमें संशोधन कर 1998 में फिर से केंद्रीय जल आयोग को भेजा गया। इसके बावजूद परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसकी प्रमुख वजहें पर्यावरणीय मंजूरी, पुनर्वास की चुनौतियां, लागत बंटवारा और राज्यों के बीच सहमति का अभाव रहीं। 2008 में मिला राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा वर्ष 2008 में किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया। इससे उम्मीद जगी कि अब निर्माण कार्य जल्द शुरू होगा। लेकिन राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बाद भी अगले 17 वर्षों तक निर्माण शुरू नहीं हो पाया। तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक अड़चनें लगातार सामने आती रहीं। 2014 के बाद मिली रफ्तार 13 सितंबर 2014 को प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई महत्वपूर्ण बैठक के बाद परियोजना को नई गति मिली। बैठक में सहमति बनी कि यदि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश संयुक्त उपक्रम बनाते हैं तो केंद्र सरकार विद्युत घटक की लागत का 90 प्रतिशत तक वहन करने पर विचार करेगी। इसके बाद 16 जनवरी 2017 को किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड (KCL) का गठन किया गया, जो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सरकारों का 50:50 संयुक्त उपक्रम है। कंपनी को परियोजना की डीपीआर, तकनीकी अध्ययन और क्रियान्वयन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई। दिल्ली के जल संकट और यमुना पुनर्जीवन से जुड़ा है मामला पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार यमुना नदी में सालभर पर्याप्त जल प्रवाह सुनिश्चित करने, प्रदूषण कम करने और रिवर फ्रंट विकास को गति देने पर जोर दे रही है। किशाऊ और लखवाड़ परियोजनाओं को इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। माना जा रहा है कि परियोजना पूरी होने पर यमुना में स्वच्छ जल प्रवाह बढ़ेगा और दिल्ली को अतिरिक्त जल उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। डीपीआर और राज्यों की सहमति थी सबसे बड़ी चुनौती अब तक परियोजना की सबसे बड़ी बाधा जल बंटवारा, बिजली हिस्सेदारी, लागत साझेदारी और पुनर्वास पैकेज को लेकर राज्यों के बीच सहमति न बन पाना था। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में छह राज्यों के MoU के लिए सहमत होने के बाद इन अड़चनों को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। विस्थापन की चुनौती अब भी बरकरार परियोजना से जहां लाखों लोगों को लाभ मिलने की उम्मीद है, वहीं इसका सामाजिक प्रभाव भी बड़ा है। अनुमान है कि बांध बनने पर 17 गांव पूरी तरह पानी में डूब सकते हैं और करीब 1000 परिवारों का विस्थापन हो सकता है। परियोजना के लिए उत्तराखंड की लगभग 1452 हेक्टेयर और हिमाचल प्रदेश की 1498 हेक्टेयर भूमि का उपयोग किया जाएगा। इसके कारण उत्तराखंड के 9 और हिमाचल प्रदेश के 8 गांव जलमग्न क्षेत्र में आ जाएंगे। स्थानीय लोग मुआवजे, पुनर्वास और आजीविका को लेकर लगातार चिंता जता रहे हैं। क्या अब सच में बनेगा किशाऊ? कई दशकों से यही सवाल पूछा जाता रहा है। लेकिन इस बार तस्वीर पहले से अलग दिखाई दे रही है। पहली बार परियोजना से जुड़े प्रमुख राज्यों ने MoU पर सहमति जताई है और लागत साझेदारी का फॉर्मूला भी तय हो गया है। अब MoU पर हस्ताक्षर होने के बाद परियोजना को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। यदि वहां से भी हरी झंडी मिलती है तो करीब 86 साल पुरानी यह परियोजना आखिरकार कागजों से निकलकर जमीन पर उतर सकती है। किशाऊ बहु-उद्देशीय बांध परियोजना केवल एक बांध नहीं बल्कि उत्तर भारत की जल सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन, सिंचाई व्यवस्था और यमुना पुनर्जीवन से जुड़ा एक बड़ा विजन है। हालांकि पुनर्वास और पर्यावरणीय चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन राज्यों के बीच बनी ताजा सहमति ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को हकीकत बनने के सबसे करीब पहुंचा दिया है। -------------------------- ये खबर भी पढ़ें… नेपाल के प्रतिबंध से सड़ने लगे फल, 80% घटी बिक्री:बनबसा-टनकपुर से रोज 25000kg होती थी सप्लाई; ट्रांसपोर्ट कारोबार पर भी असर नेपाल सरकार द्वारा आम, केला समेत कुछ फल और सब्जियों के आयात पर लगाए गए प्रतिबंध का असर भारत-नेपाल सीमा से लगे बनबसा और टनकपुर के बाजारों में साफ दिखाई देने लगा है। सीमांत क्षेत्र के व्यापारियों का दावा है कि बिक्री में 70 से 80 प्रतिशत तक गिरावट आई है और कई दुकानों व गोदामों में रखा फल खराब होने लगा है। (पढ़ें पूरी खबर)