तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 लोकसभा सांसदों के बगावत कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने के फैसले ने दिल्ली से लेकर पटना और अमरावती तक के सियासी समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। इस उलटफेर ने BJP को बैसाखियों के सहारे से मुक्त कर दिया है, जिसके कारण नीतीश कुमार की JDU और चंद्रबाबू नायडू की TDP की 'किंगमेकर' वाली हैसियत और बार्गेनिंग पावर बेहद कम हो गई है। आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में समझते हैं केंद्र की सत्ता का यह नया समीकरण क्या है और इसका नीतीश कुमार पर क्या असर पड़ेगा… सबसे पहले मोदी सरकार के नई सिनेरियो को समझिए… 2024 के लोकसभा चुनाव में BJP को 240 सीटें मिलीं, बहुमत के जादुई आंकड़े 272 से 32 सीटें कम थीं। शुरुआत में उसे सरकार चलाने के लिए नायडू की TDP के 16 और नीतीश की JDU के 12 सांसदों की बैसाखी की जरूरत थी (240 + 16 + 12 = 268, जो बहुमत के करीब था)। इन दो बड़ी पार्टियों के अलावा 11 पार्टियों के 24 सांसदों का समर्थन था। यानी TMC के 20 बागियों के आने से पहले तक मोदी सरकार के पास टोटल 282 सांसद थे, मतलब बहुमत से 10 ज्यादा। TMC से अलग हुए 20 सांसदों के NDA में आने से कुल आंकड़ा 312 पर पहुंच गया है। यानी बहुमत से 40 ज्यादा। इसका मतलब यह है कि अब अगर JDU या TDP में से कोई एक या दोनों ही दल मोदी सरकार से समर्थन वापस भी ले लें, तब भी मोदी सरकार सुरक्षित रहेगी। 312-28=284। यानी बहुमत से 12 ज्यादा। TMC के बागियों ने नीतीश का कैसे काम बिगाड़ा, 4 पॉइंट में पश्चिम बंगाल से उठी TMC की बगावत की लहर ने केवल ममता बनर्जी को ही झटका नहीं दिया, बल्कि दिल्ली में नीतीश कुमार की राजनीतिक ताकत को भी 'न्यूट्रलाइज' कर दिया है। अब NDA सरकार पूरी तरह 'मोदी-सेंट्रिक' मोड में आ चुकी है। इसका नीतीश कुमार पर 4 तरीके से असर पड़ेगा। 1. NDA सरकार में दखलअंदाजी कम होगी इससे पहले नीतीश कुमार केंद्र की नीतियों (जैसे UCC, वन नेशन वन इलेक्शन) पर अपनी शर्तों को लेकर दबाव बनाते थे। संसद में किसी भी बड़े बिल को पास कराने के लिए BJP को JDU के 12 वोटों की सख्त जरूरत थी। अब बीजेपी के पास बागी TMC सांसदों (NCPI) और अन्य छोटे दलों के रूप में एक मजबूत बैकअप प्लान तैयार है। यदि नीतीश कुमार किसी नीति या कानून पर असहमति जताते हैं, तो सरकार उनकी परवाह किए बिना आगे बढ़ सकती है। केंद्र सरकार में JDU का पावर अब खत्म हो चुका है। 2. मोदी कैबिनेट में तीसरी बर्थ मिलने की संभावना कम अभी मोदी कैबिनेट में JDU कोटे से दो मंत्री हैं-राजीव रंजन प्रसाद सिंह उर्फ ललन सिंह और रामनाथ ठाकुर। 20 जून के आसपास होने वाले मोदी कैबिनेट फेरबदल और विस्तार में JDU कोटे से एक मंत्री को शामिल करने की पूरी संभावना थी। बिहार में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद नीतीश कुमार की नजर कुछ और भारी-भरकम मंत्रालयों पर थी ताकि वे बिहार में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत दिखा सकें। अब समीकरण बदल चुके हैं। बीजेपी को समर्थन देने वाले 20 नए सांसदों के धड़े को भी कैबिनेट में जगह मिलने की चर्चा है। ऐसे में भाजपा JDU को तीसरा मंत्री पद देने की मांग को आसानी से दरकिनार कर सकती है। अब नीतीश कुमार को 'दबाव की राजनीति' के दम पर मनचाहे मंत्रालय या अतिरिक्त बर्थ मिलना लगभग नामुमकिन है। 3. बिहार सरकार में भी कम हो सकती है दखलअंदाजी अप्रैल 2026 में नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था और वे राज्यसभा चले गए, जिसके बाद बीजेपी के सम्राट चौधरी बिहार के नए मुख्यमंत्री बने। इसके बावजूद केंद्र में JDU के मजबूत होने के कारण बिहार की NDA सरकार की नीतियों और फैसलों में नीतीश कुमार का अच्छा-खासा दखल बना हुआ था। केंद्र में JDU पर निर्भरता खत्म होते ही बिहार में बीजेपी अब पूरी तरह स्वतंत्र होकर काम कर सकती है। राज्य के प्रशासन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और आगामी योजनाओं में अब नीतीश कुमार या JDU का दबाव नहीं चलेगा। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी अब बिहार सरकार को पूरी तरह अपने एजेंडे के हिसाब से चला सकती है। 4. Die JDU verliert möglicherweise ihren Status wie die BJP. Bei der Sitzverteilungsformel in Bihar hat sich die JDU bisher als älterer Bruder oder gleichgestellt mit der BJP gehalten (50-50 oder nahezu gleiche Sitze). Nitish Kumar nutzte immer die Tatsache aus, dass er bei weniger Sitzen die Seite wechseln konnte. Die BJP wird nicht mehr in der Stimmung sein, sich bei der nächsten Versammlung oder den Wahlen zur Lok Sabha vor der JDU zu beugen. Die Angst vor einer „Kehrtwende“ von Nitish Kumar ist nun vorbei, weil die BJP ihn nicht mehr im Zentrum braucht. In einer solchen Situation kann die BJP in die Rolle des älteren Bruders schlüpfen und die JDU dazu zwingen, sich auf weniger Sitze zu konzentrieren, wodurch die politische Position der JDU in Bihar erheblich geschwächt wird.