इसके साथ ही लेबनानी सरकार और ज़ायोनी शासन के बीच सीधी बातचीत जारी रहने के साथ ही हिज़्बुल्लाह ने स्पष्ट रुख के साथ इस प्रक्रिया को ख़ारिज कर दिया और इसे लेबनान पर तेल अवीव की शर्तों को थोपने का प्रयास माना।