न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि राज्य में "राजनेताओं और नौकरशाहों की सामंती मानसिकता" ने लंबे समय से संवैधानिक शासन को सार्वजनिक सेवा के बजाय व्यक्तिगत प्रभुत्व का साधन बना दिया है।