अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाला पल्स ऑक्सीमीटर गोरे-काले लोगों का ऑक्सीजन लेवल चेक करने में भेदभाव कर रहा था। यह गोरे लोगों का ऑक्सीजन लेवल सही बताता है। जबकि, काले और सांवले लोगों का ऑक्सीजन लेवल गलत बताता रहा। लेकिन, अब ऐसा नहीं होगा। कनाडा में रहने वाली पंजाब मूल की 17 साल की स्टूडेंट गुरनूर कौर ने इस लाइफ-सेविंग मशीन के मैथमेटिकल फॉर्मूले में सुधार करके इस 53 साल पुरानी गलती को हमेशा के लिए ठीक कर दिया है। गुरनूर की इस खोज 'इगेनपल्स' के बाद अब ऑक्सीमीटर बिना किसी रंगभेद के हर इंसान के खून में ऑक्सीजन की 100% सटीक मात्रा बताएगा। इस ऐतिहासिक कामयाबी के लिए गुरनूर को कनाडा के सबसे बड़े नेशनल साइंस फेयर में 'बेस्ट प्रोजेक्ट अवॉर्ड फॉर इनोवेशन' से सम्मानित किया गया है। ऑक्सीमीटर कैसे करता था कलर डिस्क्रिमिनेशन, जानिए… 4 पॉइंट में जानिए, गुरनूर ने क्या किया… गुरनूर के लिए ऐसे शुरू हुई पल्स ऑक्सीमीटर की कहानी गुरनूर ने बताया कि जब वह इस डिलिरियम प्लेटफॉर्म का टेस्ट कर रही थीं, तो उन्होंने एक बहुत ही अजीब और चिंताजनक बात नोटिस की। उन्होंने देखा कि उनका यह एआई सिस्टम जब हल्के रंग (गोरे) की त्वचा वाले मरीजों के दिल की धड़कन और ऑक्सीजन लेवल को नापता था, तो आंकड़े बिल्कुल सही आते थे, लेकिन जैसे ही कोई सांवला या गहरे रंग का मरीज सामने आता था, तो सिस्टम की रीडिंग में गलतियों का ग्राफ अचानक बहुत ऊपर चला जाता था। गुरनूर के मन में यह सवाल बैठ गया कि आखिर एक मशीन इंसानी त्वचा के रंग के आधार पर अलग-अलग नतीजे क्यों दे रही है? उन्होंने इसे एक चुनौती की तरह लिया और अपनी पुरानी रिसर्च को थोड़ा रोककर, पल्स ऑक्सीमीटर की पूरी कार्यप्रणाली पर गहराई से अध्ययन शुरू कर दिया। उन्होंने कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर की फिजिक्स और मैथ्स की किताबों को खंगालना शुरू किया। महीनों की कड़ी मेहनत और रिसर्च के बाद आखिरकार उन्होंने उस गणितीय चूक को पकड़ ही लिया, जिसने दशकों से चिकित्सा जगत की आंखों पर पर्दा डाल रखा था। इस तरह एक नेक मकसद से शुरू हुई रिसर्च ने दुनिया की एक बहुत बड़ी समस्या का अंत कर दिया। बियर-लैम्बर्ट लॉ के सिद्धांत पर होती थी कैलकुलेशन गुरनूर ने जब अपने मॉडल की प्रेजेंटेशन दी तो उन्होंने बताया कि पारंपरिक पल्स ऑक्सीमीटर एक बहुत ही सीधे सिद्धांत पर काम करता है, जिसे विज्ञान की भाषा में 'बियर-लैम्बर्ट नियम' कहा जाता है। जब आप उंगली पर ऑक्सीमीटर लगाते हैं, तो इसके एक तरफ से दो तरह की लाइटें निकलती हैं। एक रेड लाइट और दूसरी इन्फ्रारेड लाइट। यह लाइट हमारी त्वचा, मांस और खून की नलिकाओं से होकर गुजरती है और दूसरी तरफ लगे एक सेंसर पर गिरती है। हमारे खून में मौजूद जो हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन लेकर जा रहा होता है, वह इन्फ्रारेड लाइट को ज्यादा सोखता है। वहीं, जिस हीमोग्लोबिन में ऑक्सीजन नहीं होती, वह रेड लाइट को ज्यादा सोखता है। मशीन इन दोनों लाइटों के सोखे जाने के अनुपात की गणना एक पारंपरिक समीकरण या फॉर्मूले से करती है जिसे 'रेश्यो ऑफ रेश्योज' कहा जाता है। इस पुराने फॉर्मूले में मान लिया जाता था कि त्वचा का रंग (मेलेनिन पिगमेंट) एक स्थिर यानी कंपोनेंट है जो लाइट को हर इंसान में एक जैसा ही प्रभावित करेगा, लेकिन असलियत में गहरे रंग की त्वचा में मौजूद 'मेलेनिन' लाइट को बहुत ज्यादा बिखेर देता है। पुराना गणितीय मॉडल इस बिखराव को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता था, जिससे सांवले लोगों का ऑक्सीजन लेवल असलियत से 2% से 5% तक ज्यादा दिखने लगता था। गुरनूर के नए गणितीय फॉर्मूले से ऐसे होगी गणना गुरनूर ने बताया कि उन्होंने अपनी खोज में पाया कि ऑक्सीमीटर की लाइट जब त्वचा से टकराती है, तो प्रकाश का बिखराव और त्वचा की मोटाई मिलकर एक अस्थिर टर्म पैदा करते हैं। उन्होंने इसकी रीडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्मूला में एक नया करेक्शन फैक्टर जोड़ा जो त्वचा के रंग के आधार पर लाइट के बिखराव को खुद एडजस्ट कर लेता है। आसान शब्दों में कहें तो गुरनूर का फॉर्मूला मशीन को यह बताता है कि अगर त्वचा का रंग गहरा है और लाइट ज्यादा बिखर रही है, तो गणितीय गणना में से उस बिखराव के असर को माइनस कर दो। इस नए गणितीय सुधार के बाद, जैसे ही लाइट उंगली से पार होगी, सेंसर सिर्फ खून में मौजूद ऑक्सीजन को ही गिनेगा, त्वचा का रंग चाहे कितना भी गहरा हो, वह रीडिंग को रत्ती भर भी प्रभावित नहीं कर पाएगा। यह गणितीय मॉडल हर रंग के इंसान के लिए गणना को बिल्कुल निष्पक्ष और सटीक बना देता है। सही समय पर सही इलाज और मौतों में कमी अस्पतालों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि मरीज की हालत बिगड़ने से पहले ही डॉक्टर को उसका पता चल जाए। पल्स ऑक्सीमीटर की गलत रीडिंग के कारण अब तक लाखों सांवले और अश्वेत मरीजों को समय पर ऑक्सीजन या आईस They were not able to get beds, due to which their condition worsened. In many cases, patients had to lose their lives. Data from American hospitals show that due to this shortage, the death rate of black patients was much higher. With this discovery of Gurnoor, doctors will now get accurate information, which will stop wrong treatment and save the lives of thousands and lakhs of innocent people. Gurnoor gets national award at Canada-wide science fair Gurnoor Kaur was honored at the 64th 'Canada-wide Science Fair' organized by Youth Science Canada after this historic amendment. It is Canada's most prestigious and largest young scientist competition. This science fair of the year 2026 was organized in Edmonton city of Alberta province. In the final round of this competition, 390 most promising students selected from across Canada participated, who presented 344 excellent projects related to science and technology. A large judging panel of more than 250 renowned scientists, professors and doctors was formed to examine all these projects and select the winners. Gurnoor Kaur was given the biggest award of this fair i.e. 'Best Project Award for Innovation' for her project EigenPulse. Renee Barlow, executive director of Youth Science Canada, praised Gurnoor, saying, "When an 11th grade student discovers and fixes a flaw in medical technology that has killed many people for more than three decades, it proves what young people can do if their curiosity is channeled and supported. Gurnoor has done our country proud." Also read this news... Punjabi truck driver sentenced to 75 years imprisonment in America, will not get bail for 55 years. In America, the court has sentenced a truck driver of Punjabi origin to 75 years imprisonment. Police had seized cocaine worth Rs 90 crore from him. He was carrying 106Kg of cocaine hidden in garbage packets. However, the driver in his defense said that he was not aware of it. Read the full news…